दान दहेज़ की चक्की में आज पीस रही है औरत 

सभ्य समाज के हाथों आज लुट रही है औरत 

गाय की तरह बाँध रहे हैं लोग आज भी इन्हें

हर जुल्म को घुट के आज सह रही है औरत 

नित नये क़ानून को थोपा जाता है इसके माथे

दुनिया के झूठे उसूलों में आज पल रही है औरत 

अब भी कुछ लोग पाँव की जूती ही समझते हैं इन्हें 

मर्दों के पाँव तले आज भी कुचल रही है औरत

तन के साथ होता है इनके मन का भी बलात्कार 

इंसान की दरिंदगी से आज दहल रही है औरत 

रिश्तों की मर्यादा के लिये सी लिया है जुबान इसनें 

माँ-बहन-बीवी के रूप में आज सिसक रही है औरत 

जुल्म के हद के बाद भी जुल्म हो रहा है इस पर 

जीते जी कहीं कहीं पर आज भी जल रही है औरत


नीलकमल वैष्णव”अनिश”

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