जब कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

वो एक शख्स जो मिलता भी नहीं, और भूलता भी नहीं, 

चुभता कितना है… रातों की अंगडाईयां में, 

या सुबह की परछाइयों में, सूनापन कितना है…

जो कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

बैठे बैठे नम हो जाती है ये आँखे, इन आँखों में इंतज़ार है…

पुरा समन्दर जो तौल न पाया, उन दो बूंदों में, प्यार कितना है…

जो कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

शाम हुई है, के सूरज ढल गया…

जो मिले ही नहीं कभी, उनको खोना कैसा है…

जो कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

उन पुरानी यादों में, या फिर शायरों की बातों में, नाम किसका है…

जो कभी प्यार करो मालुम हो, के हुस्न -ए- दिवानगी में नशा कितना है…

रातों को जो सोने न दे, किसी और का होने न दे, 

ऐसी मोहब्बत में, प्यार कितना है…

जो कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

जो अकेले कमरे में घंटो बैठे रहे, ना कुछ सूझे उसके सिवाय, 

न कुछ किया ही जाए, ऐसी शामों में, इंतज़ार कितना है…

जो कभी प्यार करो तो मालुम हो, के दर्द कितना है…

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