Archive for दिसम्बर, 2012


images

हमारे मोहल्ले में, एक बहुरुपिया आया
तरह तरह का उसने, मजमा लगाया

वह अनेक पात्र कि भूमिका, जीवंत कर रहा था
कभी वह शैतान तो कभी संत बन रहा था

आइये मेहरबान कदरदान, देखिये कैसे बिकता है ईमान
वह करता नमस्कार,हिंदू को राम राम, मुस्लिम को सलाम

आज मेरा ये जमूरा, आप सबको खूब हंसाएगा
बहुरूपिये का खेल दिखाकर, देश का हाल सुनाएगा

तब उस जमूरे ने, कुल्हा मटकाकर नाच दिखाया
बहुरूपिये का वेश धर, उछलकर सामने आया

मैं नेता बनकर, खूब भ्रष्टाचार करता हूँ
देश-प्रेम कि भावना का व्यापार करता हूँ

चारा भी खाता हूँ ताबूत भी चबाता हूँ
यूरिया और डामर तक पचा डालता हूँ

मैं अधिकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हूँ
हर कार्य में बढ़-चढ़कर चढ़ावा लेता हूँ

तब कही कोई परमिशन देता हूँ
उस पर भी अलग से कमीशन लेता हूँ

मैं पुलिस का ही संरक्षण करता हूँ
मासूम और बेगुनाहों का खूब भक्षण करता हूँ

यूँ भी रसूकदार लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाता हूँ
इसलिए तो असहाय और कमजोरों का जुगाड़ लगाता हूँ

दो नम्बरी लोगों को तो बिलकुल भी नहीं छोड़ता हूँ
छोटी मछलियों से अपना पूरा हिस्सा पूरी तरह निचोड़ता हूँ

वैसे आज कल खूब कर रहा हूँ दबंगाई
क्या करूँ महाशय कितनी बढ़ गयी है महंगाई

मैं युवा के रूप में हर अर्थ बदल देता हूँ
अपने आकाओं के इशारे पर अनर्थ कर देता हूँ

दंगा-फसाद या हड़ताल में भी मैं ही काम आता हूँ
तोड़-फोड और मार-काट का सारा सामन लाता हूँ

छात्र के रूप में तो हंगामा ही मचा देता हूँ
शासन और प्रशासन के नाक में दम कर देता हूँ

छात्र-शक्ति, राष्ट्र-शक्ति हमसे टकराएगा कौन
आखिर हम जहाँ अड़ गये वहाँ आयेगा कौन ?

मैं उद्योगपति बनकर करोड़ों का चंदा देता हूँ
इसलिए हर मोर्चा पर कोई भी पंगा ले लेता हूँ

श्रमिकों का शोषण तो मेरा पहला उसूल है
पानी बिजली और टैक्स चोरी का आरोप एकदम फिजूल है

मैं डाक्टर अस्पताल को ही बीमार करता हूँ
किडनी हार्ट ब्लड का फुलटाइम जॉब करता हूँ

सरकारी दवा बिक्री का धंधा फिलहाल कमजोर है
मुफ्त इलाज कराने वाला ही सबसे बड़ा चोर है

इसलिए मुझे घर में ही प्रेक्टिस कि आदत है
दक्षिणा बिना मरीज देखना तो बिलकुल ही लानत है

साथ ही दवा दुकानों से भी मेरा परसेंट फिक्सशेसन होता है
तभी तो साधारण बीमारी में भी महँगी दवाई का सलेक्शन होता है

मैं ठेकेदार कि भूमिका भी खूब निभाता हूँ
सीमेंट न सही रेत से ही पुल बनाता हूँ

फिर भी जो कोई मेरा करता विरोध
अपने लठैतों से धुल चटाता हूँ

बाँध वगैरह के लिए भी करता यही तिकड़मबाजी
हरे-भरे नोटों के आगे कैन नहीं होगा राजी ?

जमूरे के इस खेल से लोग खूब हँस रहे थे
तो कुछ पीड़ित ऐसे भी थे जो अपनी बांह कास रहे थे

मैं आम आदमी दिन-रात खून-पसीना बहाता हूँ
तब कही जाकर दो वक्त कि रोटी जुटा पाता हूँ

यूँ तो मेरे नाम पर विकास योजनाओं का
यहाँ से वहाँ तक अंबार लगा दिया जाता है

मगर साहेबान जब जब आती है मेरी बारी
तो जाने क्यों मुझे ही भुला दिया जाता है

मेरे हिस्से का राशन कोई धन्ना सेठ खा जाता है
तो मेरा घासलेट कोई अधिकारी पी जाता है

मुझ गरीब का पेंशन तो सरपंच ही गटक जाता है
कभी चला जाऊं माँगने तो मुझ पर ही भड़क जाता है

अंत में जमूरा फिर कहता है बुरा ना मानना भाई साब
मैं तो ये सब कुछ पापी पेट के लिए करता हूँ माई-बाप

मगर प्रजातंत्र के रखवालों कि ऐसी भी क्या मज़बूरी है
सिर्फ अपना घर भरने के लिए ईमान बेचना क्या जरुरी है ?

®शशिकांत साहू
ग्राम-कुटेला(खेलभांठा)
सारंगढ़, रायगढ़(छग)

कभी-कभी

अजीब लगती है शाम कभी-कभी

जिंदगी लगती है बेजान कभी-कभी

समझ में आये तो हमें भी बताना ‘दोस्त’

क्यों करती है यादें परेशान कभी-कभी…

Untitled

421494_331136436961320_

अब मैं किसी पहचान का मोहताज नहीं ऐ ‘अनिश’

तेरी मुहब्बत में मैं बदनाम ही इस कदर हुआ हूँ…

®नीलकमल वैष्णव”अनिश”

डायरी…

क्या मैं यूँ ही तेरी यादों कि किताब को सहेजने के लिए हूँ ?

जो तू कभी भी मुझे याद करके एक नया अध्याय खोल देती है…

images (8)®नीलकमल वैष्णव”अनिश”

उनकी बेरुखी और मेरी बेकरारी कुछ यूँ है ?
जैसे दोनों में शर्त लगी है कौन जीतेगा…

®नीलकमल वैष्णव”अनिश”