Category: कविता


दान दहेज़ की चक्की में आज पीस रही है औरत 

सभ्य समाज के हाथों आज लुट रही है औरत 

गाय की तरह बाँध रहे हैं लोग आज भी इन्हें

हर जुल्म को घुट के आज सह रही है औरत 

नित नये क़ानून को थोपा जाता है इसके माथे

दुनिया के झूठे उसूलों में आज पल रही है औरत 

अब भी कुछ लोग पाँव की जूती ही समझते हैं इन्हें 

मर्दों के पाँव तले आज भी कुचल रही है औरत

तन के साथ होता है इनके मन का भी बलात्कार 

इंसान की दरिंदगी से आज दहल रही है औरत 

रिश्तों की मर्यादा के लिये सी लिया है जुबान इसनें 

माँ-बहन-बीवी के रूप में आज सिसक रही है औरत 

जुल्म के हद के बाद भी जुल्म हो रहा है इस पर 

जीते जी कहीं कहीं पर आज भी जल रही है औरत


नीलकमल वैष्णव”अनिश”

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रंग डारौ रे संगी 

जिनगी ला होली मा
मीठ-मीठ बोली मा
रंग डारौ रे संगी

झगरा लड़ाई में मया दुरि हावै
सहजे बोली हां कैसे करूआवै
ये करुहा बोली ला
रंग डारौ रे संगी

महल अटारी बहुत बनाये
कहुं में नई हमाय
नई बनाय मया के
एक ठन खोली ला
रंग डारौ रे संगी

ऊंच नीच के भेद
तोर बनावल
धुरिहा धुरिहा ले पहुँचे 
अपने तीर नई सके पहुँच
जिनगी कटे ठोली बोली मा
रंग डारौ रे संगी

ये करुहा बोली ला
ये मया के खोली ला
ये ठोली बोली ला
रंग डारौ रे संगी

गीत & रचनाकार- भुवन लाल श्रीवास जी

महासमुंद 

कोई रूठे यहाँ तो कौन मनाने आता है 

रूठने वाला खुद ही मान जाता है, 

ऐ अनिश दुनियां भूल जाये कोई गम नहीं 

जब कोई अपना भूल जाये तो रोना आता है…

जब महफ़िल में भी तन्हाई पास हो 

रौशनी में भी अँधेरे का अहसास हो, 

तब किसी कि याद में मुस्कुरा दो 

शायद वो भी आपके इंतजार में उदास हो…

फर्क होता है खुदा और पीर में 

फर्क होता है किस्मत और तक़दीर में 

अगर कुछ चाहो और ना मिले तो 

समझ लेना कि कुछ और अच्छा है हाथो कि लकीर में.

नीलकमल वैष्णव”अनिश”

०९६३०३०३०१०, ०७५६६५४८८००

कभी पहली बार स्कूल जाने में डर लगता था

और आज हर रास्ता खुद ही चुनते हैं,

कभी घरवालों कि हर बात सच्ची लगती थी,

और आज उनसे ही झूठ हम बोलते हैं !

कभी छोटी सी चोट कितना रुलाती थी 

और आज दिल टूटे फिर भी संभल जाते हैं, 

पहले दोस्त बस साथ खेलते तक याद रहते थे 

और आज दोस्त जान से ज्यादा प्यारे लगते हैं !

इस जिंदगी में टेंसन ही टेंसन है 

फिर भी लबों पे मुस्कान है क्योंकि, 

जीना जब हर हाल में है तो 

मुस्कुराकर जीने में क्या नुकसान है ! 

पैगाम

ऐ रब मेरे प्यार तक यह पैगाम पहुंचा दे
उसके दिल में मेरा ख्याल जगा दे
खो गए हैं वो अपनी दुनियां में कहीं
बस उसको मेरी याद दिला दो…

प्यार शब्दों का मोहताज नहीं होता 
दिल में हर किसी का राज नहीं होता 
क्यों इंतज़ार करते हैं सब वेलेंटाइन डे का 
क्या साल का हर दिन प्यार का हक़दार नहीं होता…

इंसान इतना कमजोर है कि छोटी-छोटी चीजों से डर जाता है,
और
ऐ ‘अनिश’ बहादुर इतना है कि “भगवान” से भी नहीं डरता…
शुभ प्रभात दोस्त

“सांझ का दर्द”

खुश है गर वो हमें याद ना करके,
हँस रहे हैं वो हमसे बात ना करके !
यह हँसी उनके होंठों से कभी ना जाए,
खुदा करे वो हमारी मौत पर भी मुस्कुराए !!

बड़ी अजीब है इस नादान दिल कि ख्वाहिश
एक शख्स इसका होना नहीं चाहता
और ऐ ‘अनिश’
यह उसको खोना नहीं चाहता…

*वाह रे मोहब्बत*

कौन कहता है प्यार करना पाप है
प्यार के लिए तो बने हम आप हैं
प्यार तो जीवन का जाप हैं
सिर्फ प्यार के लिए उन्हें मत
ठुकराना जो हमारे माँ-बाप है !!

“आप सभी को इस नये प्रेम-दिवस कि हार्दिक शुभकामनाएं”